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Uttarakhand.Roopkund Human Remains: A Mystery That Remains Unsolved रूपकुंड मानव अवशेष : एक रहस्य जो अभी भी अनसुलझा है. By Vinay Semwal

रूपकुंड के मानव अवशेषों पर अब तक हुए प्रमुख अध्ययनों और उनके बदलते वैज्ञानिक आकलनों पर विनय सेमवाल की रिपोर्ट

उत्तराखंड के चमोली जिले में लगभग 5,029 मीटर की ऊँचाई पर स्थित रूपकुंड झील नंदा देवी राजजात/बड़ी जात के मार्ग से जुड़ी होने के कारण श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था का भी केंद्र है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ आसपास बिखरे मानव अस्थि-अवशेषों के कारण यह पिछले आठ दशकों से मानवशास्त्रियों, पुरातत्वविदों, इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के लिए शोध एवं जिज्ञासा का विषय बनी हुई है। वर्ष के अधिकांश समय बर्फ से ढकी रहने वाली यह छोटी हिमानी झील नंदा घुंघटी और त्रिशूल पर्वत-समूह के बीच स्थित है।
स्थानीय लोकपरंपरा इसे नंदा देवी, भगवान शिव और कन्नौज के राजा जसधवल की कथा से जोड़ती है। लोकपरंपरा के अनुसार भगवान शिव ने नंदा की प्यास बुझाने के लिए अपने त्रिशूल की चोट से झील का निर्माण किया था। नंदा ने जल पीते समय झील में अपना प्रतिबिंब देखा, जिसके कारण इसका नाम रूपकुंड पड़ा। इसे रुद्रकुंड के नाम से भी संबोधित किए जाने की परंपरा मिलती है।
1942 में झील के आसपास मानव अवशेषों की पहली स्पष्ट आधिकारिक सूचना सामने आने के बाद रूपकुंड केवल धार्मिक आस्था और लोककथा का विषय नहीं रहा, बल्कि मानव इतिहास से जुड़े प्रश्नों का भी महत्वपूर्ण स्थल बन गया। इसके मानव अवशेषों के कारण आधुनिक लोकप्रिय साहित्य में इसे “Skeleton Lake” तथा कभी-कभी “Mystery Lake” जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है।
इन अवशेषों से जुड़े प्रश्न—ये लोग कौन थे, वे कब यहाँ पहुँचे और किन परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई—जानने के लिए शुरू हुई वैज्ञानिक जाँच समय के साथ मानवशास्त्र, रेडियोकार्बन आयु-निर्धारण, अस्थि-अध्ययन, स्थिर समस्थानिक विश्लेषण और अंततः प्राचीन DNA अध्ययन तक पहुँची। इन अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि रूपकुंड में मिले सभी मानव अवशेषों को किसी एक घटना में मारे गए लोगों का समूह मानना उचित नहीं है। दूसरी ओर, स्थानीय लोकपरंपरा इन्हें राजा जसधवल की यात्रा से जोड़ती है, लेकिन इस कथा और सभी मानव अवशेषों के बीच प्रत्यक्ष ऐतिहासिक संबंध अभी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है।


रूपकुंड अनुसंधान : एक संक्षिप्त कालक्रम
1942- एच.के. माधवाल- मानव अवशेषों की पहली स्पष्ट आधिकारिक सूचना
1955–56- विभिन्न भारतीय संस्थानों के अभियान – मानवशास्त्रीय/मानवमितीय अध्ययन, अवशेष एवं सांस्कृतिक सामग्री का दस्तावेजीकरण
1959 – स्वामी प्रणवानंद – जसधवल की लोककथा को रूपकुंड से जोड़ने का प्रयास
2003–04 — National Geographic से संबंधित अभियान — सीमित नमूनों पर DNA, AMS रेडियोकार्बन एवं मानवशास्त्रीय अध्ययन; — लगभग 9वीं शताब्दी की एक घटना की व्याख्या लोकप्रिय हुई
2019 — Harney et al., Nature Communications — 76 अस्थि-नमूने; 38 व्यक्तियों के जीनोम के बड़े हिस्से का DNA विश्लेषण; तीन आनुवंशिक समूह तथा कम-से-कम दो प्रमुख कालगत अवस्थाओं के प्रमाण
1942 : एच.के. माधवाल और पहली आधिकारिक सूचना
2 सितम्बर 1942 को वन अधिकारी एच.के. माधवाल ब्रह्मकमल (Saussurea obvallata) और फेन कमल (Saussurea simpsoniana) के बीज एकत्र करने के सिलसिले में रूपकुंड क्षेत्र में पहुँचे। वहीं उन्होंने झील के आसपास बड़ी संख्या में मानव शरीर और अस्थि-अवशेष देखे। इसकी सूचना तत्कालीन गढ़वाल के डिप्टी कमिश्नर आर.वी. वर्नेड़े (R. V. Vernede) को दी गई, जिन्होंने मामला तत्कालीन कुमाऊँ कमिश्नर मिस्टर एक्टन (Mr. Acton) को भेजा।
एक्टन ने संभावना व्यक्त की कि ये अवशेष 1841 के तिब्बती अभियान के दौरान मारे गए जोरावर सिंह की सेना से संबंधित हो सकते हैं। बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस संभावना का समर्थन नहीं किया। माधवाल की 1942 की सूचना का महत्त्व इसलिए है कि इसे रूपकुंड मानव अवशेषों के प्रथम स्पष्ट आधिकारिक अभिलेखन के रूप में देखा जाता है।
1955–56 : वैज्ञानिक जाँच का पहला चरण
1955 में रूपकुंड का पुनः अभियान हुआ। उस समय तक बर्फ के पिघलने, हिम और चट्टानों के खिसकने तथा मौसम के प्रभाव जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं के कारण स्थल की स्थिति पहले की तुलना में काफी बदल चुकी थी। 1942 में माधवाल ने जिन मानव अवशेषों को अपेक्षाकृत पूर्ण अवस्था में देखने की बात दर्ज की थी, वे बाद के अभियान में अधिक बिखरे हुए मिले। समकालीन विवरणों में यह भी दर्ज है कि लगभग 1925 के आसपास की यात्रा में कुछ लोगों ने बर्फ के नीचे कपड़ों सहित मानव शरीर देखे होने की सूचना दी थी।
1955–56 के अभियानों में मानव खोपड़ियों, जबड़ों और अन्य अस्थियों के साथ चमड़े की चप्पलें, लकड़ी की छड़ें, बर्तन तथा अन्य सामग्री मिलने की जानकारी सामने आई। इन वस्तुओं से यह संभावना बनी कि मृतकों में तीर्थयात्री भी शामिल हो सकते थे।1956 में Anthropological Survey of India तथा अन्य संस्थानों के दलों ने मानव अवशेषों की आयु, लिंग, कद-काठी और शरीर की बनावट जैसी विशेषताओं का व्यवस्थित अध्ययन किया। इस दौरान मानवमिति (Anthropometry), अर्थात शरीर के विभिन्न अंगों और कद-काठी का वैज्ञानिक मापन, के आधार पर कुछ अलग-अलग शरीर-प्रकारों की चर्चा भी हुई।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उस समय के मानवमितीय “शरीर-प्रकार” आधुनिक DNA से निर्धारित आनुवंशिक पृष्ठभूमि के समान नहीं थे। वे मुख्यतः शारीरिक माप और बनावट पर आधारित आकलन थे।

रेडियोकार्बन और राजा जसधवल की कथा
प्रारंभिक रेडियोकार्बन अध्ययनों से प्राप्त तिथियों ने जोरावर सिंह की 1841 वाली परिकल्पना को कमजोर किया और अवशेषों को कहीं पुराने, मध्यकालीन काल से जोड़ने की दिशा में ध्यान आकर्षित किया। इसी समय इन अवशेषों को रूपकुंड की स्थानीय लोककथा की ऐतिहासिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास भी हुए।
इस लोकपरंपरा के अनुसार कन्नौज के राजा जसधवल अपनी गर्भवती रानी बालम्पा, सेवकों और नर्तकियों सहित नंदा देवी की यात्रा पर निकले थे। यात्रा के दौरान पातर नचौणिया आदि प्रसंगों के बाद भयंकर ओलावृष्टि या हिमपात में पूरा दल नष्ट हो गया। स्वामी प्रणवानंद ने 1959 के अपने लेख The Rupkund Mystery—Solved में नौटी के लोकगीतों को इस कथा का महत्वपूर्ण आधार माना। लेकिन लोककथा और ऐतिहासिक घटना के बीच संबंध सिद्ध करने के लिए स्वतंत्र पुरातात्त्विक एवं वैज्ञानिक प्रमाण भी आवश्यक थे। इसलिए जसधवल की कथा को लोक-स्मृति और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन उसे रूपकुंड के सभी मानव अवशेषों की वैज्ञानिक रूप से सिद्ध ऐतिहासिक व्याख्या मानना उचित नहीं है।
2003–04 : “एक घटना” की धारणा कैसे बनी?
2003 में National Geographic से संबंधित एक टीम ने रूपकुंड पर अभियान किया। मानव अवशेषों के DNA, मानवशास्त्र और AMS रेडियोकार्बन डेटिंग (Accelerator Mass Spectrometry Radiocarbon Dating) से संबंधित कार्य विभिन्न भारतीय और विदेशी संस्थानों के सहयोग से हुआ। इस अध्ययन से संबंधित सामग्री बाद में वृत्तचित्र के रूप में भी सामने आई।
उस समय उपलब्ध सीमित रेडियोकार्बन नमूनों के आधार पर कुछ अवशेष लगभग 1,200 वर्ष पुराने पाए गए। इन परिणामों और मानवशास्त्रीय सामग्री के आधार पर लगभग 9वीं शताब्दी में हुई एक बड़ी सामूहिक मृत्यु की व्याख्या लोकप्रिय हुई। हालाँकि, बाद के 2019 के अध्ययन ने इस तस्वीर को काफी विस्तृत किया। 2019 के शोध में पहले किए गए सीमित नमूना-आधारित अध्ययन की तुलना में अधिक व्यापक संख्या में अवशेषों का आनुवंशिक और काल निर्धारण संबंधी विश्लेषण किया गया। इससे यह सामने आया कि रूपकुंड के मानव अवशेषों में बाद के काल के लोग भी शामिल थे, जिन्हें पहले के सीमित नमूना-आधारित अध्ययन में पहचाना नहीं जा सका था।
इसलिए 2003–04 का अध्ययन उस समय उपलब्ध नमूनों के आधार पर किया गया महत्वपूर्ण प्रारंभिक आधुनिक अध्ययन था, लेकिन उसके आधार पर बनी लगभग 9वीं शताब्दी की एकल सामूहिक मृत्यु की व्याख्या को 2019 के व्यापक अध्ययन के बाद पूरे रूपकुंड अस्थि-संग्रह का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
2019 : प्राचीन DNA ने बदली तस्वीर
2019 में Éadaoin Harney एवं उनके सहकर्मियों का शोध वैज्ञानिक शोध-पत्रिका Nature Communications में “Ancient DNA from the skeletons of Roopkund Lake reveals Mediterranean migrants in India” शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस अध्ययन ने रूपकुंड के मानव अवशेषों के अध्ययन को प्राचीन DNA, रेडियोकार्बन और स्थिर समस्थानिकों के संयुक्त विश्लेषण के आधार पर एक नए स्तर पर पहुँचा दिया।
शोधकर्ताओं ने रूपकुंड से प्राप्त 76 मानव अस्थि-नमूनों का अध्ययन किया, जिनमें 72 लंबी अस्थियाँ और चार दाँत शामिल थे। इनमें से 38 व्यक्तियों के जीनोम के बड़े हिस्से का DNA विश्लेषण किया जा सका। इसके अतिरिक्त 37 नमूनों की रेडियोकार्बन विधि से आयु निर्धारित की गई और 45 नमूनों का स्थिर समस्थानिक विश्लेषण कर उनके आहार संबंधी संकेतों का अध्ययन किया गया।
38 व्यक्तियों के DNA के बड़े हिस्से का विश्लेषण करने पर तीन अलग-अलग आनुवंशिक पृष्ठभूमियाँ सामने आईं। शोधकर्ताओं ने आनुवंशिक समानताओं के आधार पर इन्हें Roopkund_A, Roopkund_B और Roopkund_C नाम से तीन आनुवंशिक समूहों में वर्गीकृत किया।

  • Roopkund_A — 23 व्यक्ति: दक्षिण एशियाई आनुवंशिक पृष्ठभूमि से संबंधित।
  • Roopkund_B — 14 व्यक्ति: पश्चिमी यूरेशियाई आनुवंशिक पृष्ठभूमि से संबंधित, जिनमें पूर्वी भूमध्यसागरीय आबादियों के साथ विशेष आनुवंशिक निकटता दिखाई दी।
  • Roopkund_C — 1 व्यक्ति: दक्षिण-पूर्व एशियाई आनुवंशिक पृष्ठभूमि से संबंधित।
    (यहाँ “आनुवंशिक पृष्ठभूमि” का अर्थ किसी व्यक्ति की DNA में दिखाई देने वाली उसके पूर्वजों से संबंधित आनुवंशिक समानताओं से है। इसे सीधे आधुनिक जातीय या नृजातीय पहचान के समान नहीं माना जाना चाहिए)।
    सबसे निर्णायक प्रमाण : अलग-अलग समय
    2019 के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष केवल अलग-अलग आनुवंशिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की उपस्थिति नहीं था, बल्कि उनकी कालगत भिन्नता भी थी। Roopkund_A के अधिकांश व्यक्तियों की रेडियोकार्बन आयु लगभग 7वीं से 10वीं शताब्दी ईस्वी के बीच पाई गई। इसके विपरीत Roopkund_B के 14 व्यक्ति मुख्यतः 17वीं से 20वीं शताब्दी, विशेषकर लगभग 1800 ईस्वी के आसपास के पाए गए। Roopkund_C का एक व्यक्ति भी बाद के काल से संबंधित था।
    इस प्रकार अध्ययन से मानव अवशेषों के कम-से-कम दो प्रमुख कालों में जमा होने के प्रमाण मिले, जिनके बीच लगभग एक हजार वर्ष का अंतर था। यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे रूपकुंड में मिले सभी मानव अवशेषों को किसी एक दिन हुई एक ही सामूहिक दुर्घटना का परिणाम मानना कठिन हो जाता है।
    महत्वपूर्ण बात यह भी है कि A समूह के भीतर भी सभी नमूनों की तिथियाँ समान नहीं थीं। अध्ययन में उदाहरण के रूप में दो नमूनों की कैलिब्रेटेड तिथि-सीमाएँ लगभग 675–769 ईस्वी और 894–985 ईस्वी पाई गईं। अतः A समूह के सभी व्यक्तियों को भी बिना अतिरिक्त प्रमाण के एक ही घटना में मृत मानना उचित नहीं होगा।

भोजन और भौगोलिक पृष्ठभूमि के संकेत
स्थिर समस्थानिक विश्लेषण से भी अलग-अलग समूहों के जीवन और खान-पान में अंतर के संकेत मिले। A समूह के आहार संबंधी समस्थानिक मानों में अधिक विविधता दिखाई दी, जबकि B और C समूह के मान मुख्यतः C3 प्रकार के पौधों से जुड़े स्थलीय आहार के अनुरूप पाए गए, जिनमें गेहूँ, जौ और चावल जैसे खाद्य स्रोत शामिल हो सकते हैं।
इस प्रकार समस्थानिक विश्लेषण से भी संकेत मिलता है कि रूपकुंड में मिले सभी लोग एक जैसी आहार-आधारित जीवन-पृष्ठभूमि से नहीं थे। हालाँकि, समस्थानिक परिणामों से किसी व्यक्ति के निश्चित भोजन या उसके निश्चित भौगोलिक मूल को अकेले निर्धारित नहीं किया जा सकता।
क्या रूपकुंड नंदा राजजात से जुड़ा था?
2019 के शोधकर्ताओं ने A समूह के कुछ व्यक्तियों के रूपकुंड तक पहुँचने को नंदा देवी से संबंधित प्राचीन तीर्थ-परंपरा से जोड़ने की संभावना व्यक्त की। यह व्याख्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूपकुंड वर्तमान नंदा देवी राजजात से जुड़े क्षेत्र में स्थित है और आसपास के क्षेत्र में प्राचीन धार्मिक गतिविधियों के संकेत भी मिलते हैं। लेकिन इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। तीर्थ-मार्ग से संबंध एक संभावित व्याख्या है; यह किसी व्यक्ति की पहचान या मृत्यु का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।
विशेष रूप से लगभग 1800 ईस्वी के पूर्वी भूमध्यसागरीय आनुवंशिक पृष्ठभूमि वाले 14 व्यक्तियों और दक्षिण-पूर्व एशियाई पृष्ठभूमि वाले एक व्यक्ति के रूपकुंड तक पहुँचने का उद्देश्य अभी स्पष्ट नहीं है।
स्वास्थ्य और पोषण : एक अलग वैज्ञानिक प्रश्न
रूपकुंड के मानव अवशेषों पर Alka Barthwal और S.R. Walimbe ने 27 खोपड़ी के नमूनों का अध्ययन किया। ये नमूने 2004 से 2007 के बीच छह यात्राओं में स्थल से एकत्र किए गए थे। अध्ययन में खोपड़ी तथा आँखों के गड्ढे की हड्डियों में असामान्य छोटे-छोटे छिद्र और छिद्रयुक्तता के संकेत देखे गए। आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में ये परिवर्तन porotic hyperostosis और cribra orbitalia जैसी अवस्थाओं से संबंधित हैं। ये परिवर्तन पोषणीय या शारीरिक तनाव तथा रक्ताल्पता (anemia) जैसी स्थितियों से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन इन्हें किसी एक निश्चित कारण का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह अध्ययन मृत्यु के तत्काल कारण को भी सिद्ध नहीं करता।
महत्वपूर्ण रूप से, इन 27 नमूनों का व्यक्ति-स्तर पर DNA विश्लेषण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें Harney et al. के Roopkund_A, Roopkund_B या Roopkund_C आनुवंशिक समूहों में सीधे रखना संभव नहीं है।
क्या वास्तव में “सैकड़ों लोग एक साथ मरे”?
रूपकुंड की लोकप्रिय छवि लंबे समय तक ऐसी सामूहिक दुर्घटना की रही है जिसमें बड़ी संख्या में तीर्थयात्री अचानक मारे गए। स्थानीय ओलावृष्टि की कथा और कुछ पुराने मानवशास्त्रीय निष्कर्षों ने इस धारणा को बल दिया। लेकिन 2019 के आनुवंशिक और रेडियोकार्बन अध्ययनों से प्राप्त प्रमाणों ने इस तस्वीर को अधिक जटिल बना दिया है।
अब तक उपलब्ध शोधों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि रूपकुंड में मानव अवशेष अलग-अलग कालखंडों में जमा हुए। पुराने A समूह के कुछ लोगों का संबंध किसी तीर्थ-परंपरा से रहा हो सकता है, लेकिन उनकी मृत्यु एक ही घटना में हुई थी या अलग-अलग अवसरों पर—यह अभी निर्णायक रूप से नहीं कहा जा सकता।
इसी तरह पूर्वी भूमध्यसागरीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई आनुवंशिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की रूपकुंड तक पहुँचने की परिस्थितियों की भी अभी कोई निश्चित ऐतिहासिक व्याख्या उपलब्ध नहीं है।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न
अब तक के वैज्ञानिक अनुसंधान ने रूपकुंड के मानव अवशेषों से जुड़े अनेक प्रश्नों पर नई जानकारी दी है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी खुले हैं—

  1. अलग-अलग कालखंडों के लोग इस दुर्गम क्षेत्र तक क्यों पहुँचे?
  2. लगभग 1800 ईस्वी के पूर्वी भूमध्यसागरीय आनुवंशिक पृष्ठभूमि वाले लोग हिमालय में किस उद्देश्य से आए?
  3. 7वीं–10वीं शताब्दी के A समूह के लोगों की मृत्यु एक ही घटना में हुई या अलग-अलग अवसरों पर?
  4. उनकी मृत्यु का वास्तविक कारण क्या था?
  5. क्या भीषण मौसम या ओलावृष्टि ने किसी घटना में भूमिका निभाई थी?
  6. राजा जसधवल की लोककथा और वास्तविक मानव अवशेषों के बीच ऐतिहासिक संबंध का स्वतंत्र प्रमाण कहाँ तक मिलता है?
  7. क्या भविष्य में और अधिक प्रतिनिधि अवशेषों के व्यक्ति-स्तरीय DNA, रेडियोकार्बन और समस्थानिक अध्ययन से इन प्रश्नों के अधिक स्पष्ट उत्तर मिल सकते हैं?
    इन प्रश्नों के उत्तर के लिए केवल एक विषय का अध्ययन पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए पुरातत्व, मानवशास्त्र, आनुवंशिकी, इतिहास, जलवायु-विज्ञान, भू-आकृति विज्ञान और स्थानीय मौखिक परंपराओं को एक साथ रखकर अध्ययन करना आवश्यक होगा।
    रहस्य समाप्त नहीं हुआ, उसका स्वरूप बदल गया
    रूपकुंड की कहानी 1942 में एच.के. माधवाल द्वारा मानव अवशेषों की आधिकारिक सूचना से आधुनिक शोध के केंद्र में आई। इसके बाद 1950 के दशक में मानवशास्त्रीय और प्रारंभिक रेडियोकार्बन अध्ययन हुए। लोकपरंपरा ने इसे राजा जसधवल और नंदा देवी की कथा से जोड़ा। 2003–04 के आधुनिक अभियान ने सीमित नमूनों के आधार पर लगभग 9वीं शताब्दी में हुई एक सामूहिक मृत्यु की व्याख्या को व्यापक लोकप्रियता दी।
    लेकिन 2019 के व्यापक DNA और रेडियोकार्बन अध्ययन ने इस तस्वीर को काफी अधिक जटिल बना दिया। इसमें तीन आनुवंशिक समूह सामने आए और मानव अवशेषों के कम-से-कम दो प्रमुख कालगत अवस्थाओं में जमा होने के प्रमाण मिले—एक मुख्यतः 7वीं–10वीं शताब्दी और दूसरी मुख्यतः 17वीं–20वीं शताब्दी, विशेषकर लगभग 1800 ईस्वी के आसपास की।
    इसलिए आज उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर रूपकुंड में पाए गए अवशेषों को केवल एक दिन में किसी एक हादसे में मारे गए यात्रियों के अवशेष नहीं कहा जा सकता। रूपकुंड का वास्तविक रहस्य अब केवल “कंकाल किसके हैं?” तक सीमित नहीं है। प्रश्न इससे आगे बढ़ चुके हैं—ये लोग अलग-अलग समय में यहाँ क्यों पहुँचे, उनकी मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई और उनके अवशेष एक ही स्थान पर कैसे जमा हुए?
    यही प्रश्न रूपकुंड को केवल लोककथा का विषय नहीं, बल्कि हिमालय के मानव इतिहास, तीर्थ-परंपराओं और प्राचीन मानव गतिशीलता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण शोध-स्थल बनाते हैं।

प्रमुख संदर्भ

  1. Harney, Éadaoin et al. (2019). Ancient DNA from the skeletons of Roopkund Lake reveals Mediterranean migrants in India. Nature Communications, 10, Article 3670.
  2. Negi, R.S. Rupkund Human Remains: A Mystery Yet Unresolved. Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA).
  3. Barthwal, Alka & S.R. Walimbe. Roopkund Human Skeletal Remains: A Short Note on the Signs of Nutritional Stress and Anemia on the Cranial and Orbital Surface.
  4. Harney et al. (2019). Supplementary Information — Physical Anthropology Assessment of Roopkund
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