Friday, April 3, 2026
HomeEditorial विचारEducation. बेबसी और उम्मीद के बीच झूलते स्कूल 

Education. बेबसी और उम्मीद के बीच झूलते स्कूल 

school education

 अरविन्द सरदाना

कुछ दिन पहले एक शिक्षिका ने बताया था कि उनकी शाला में विद्यार्थियों की संख्या गिरकर 18 रह गई है और
इस बीच एक और शिक्षक की नियुक्ति कर दी गई है। ऐसा करना खो—खो के खेल जैसा हो गया है, यानी कम संख्या के
कारण शिक्षक अतिशेष में आ गए हैं, जिनका कभी भी स्थानांतरण किया जा सकता है। यह स्कूल मुख्य सड़क मार्ग पर
है और यहां से शहर आना—जाना आसान है। यहां ट्रांसफर होकर आए नए शिक्षक की ‘पहुँच’ है, इसलिए ऐसा करवा लिए संभव हो पाया है। बेबसी की हद है कि यह स्कूल जो बंद होने की कगार पर है, वहां ट्रांसफर का कारोबार
जीवित है और पनप रहा है।


दस वर्ष पहले इसी प्राइमरी स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या 60 से 70 के बीच हुआ करती थी और किसी
समय 100 के करीब। मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसे सरकारी स्कूल हैं, जहां पिछले दो दशकों में विद्यार्थियों की संख्या
में कमी आई है और वे बंद होने की कगार पर पहुँच गए हैं। पहले इन शालाओं में 60 से 150 विद्यार्थी हुआ करते
थे, जबकि अब उनकी संख्या 20 से 30 के करीब रह गई है। सरकारी भाषा में कहें तो इनका अन्य शाला में विलय होना
तय है। यहाँ छात्र और शिक्षक दोनों ही बेबसी के दिन काट रहे हैं।


क्या यह बेबसी की हालत सब जगह है? हमारे आसपास कई सरकारी स्कूल हैं जहाँ व्यवस्थित पढाई हो रही है।
शाला के लिए प्रधान-अध्यापक और उनके साथ एक टीम नज़र आती है। शाला में बच्चों की संख्या पर्याप्त है और उनमें
एक उम्मीद का माहौल दिखता है। हो सकता है ये ‘सीएम राइज स्कूल’ हों, ‘मॉडल स्कूल’ या कोई सामान्य सरकारी स्कूल
हों ! खास बात यह है कि वही सरकारी तंत्र है, वे ही लोग हैं, परंतु स्‍कूल दो तरह के हैं। एक तरफ, जहाँ शालाओं को
अपने हाल पर छोड़ दिया गया है और सभी उनके बंद होने का रास्ता देख रहे हैं और दूसरी तरफ, एक उम्मीद का माहौल है। एक ही तंत्र में दो-मुंही ढ़ाँचा चल रहा है।


आखिर यह स्थिति कैसे निर्मित हुई? यह समझने के लिए स्कूल प्रशासन की जड़ों को देखना होगा। सबसे पुरानी
जड़ है, ‘ट्रांसफर नीति’ और उससे सम्बंधित व्यवहार और लेन—देन। हम देखते हैं कि कुछ स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक हैं और कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी है। यह अंतर हमें गाँव एवं शहर के बीच और रोड किनारे व अंदर के स्कूल के बीच
दिखता है। यह अंतर जिलेवार भी नज़र आता है, जैसे आदिवासी-बहुल जिले और अन्य जिले। ट्रांसफर इंडस्ट्री के चलते
शालाओं को व्यवस्थित चलाने के लिए टीम नहीं बन पाती। शिक्षक हेडमास्टर को नज़रअंदाज़ करते हैं और स्कूल का
सामान्य प्रशासन लागू नहीं हो पाता।


यह ज़रूरी है कि प्रधान अध्यापक सुचारू रूप से व्यवस्था बना पाएं और शिक्षक-नेता की जुगल बंदी को लगाम
लगे। तभी स्‍कूलों का समय से लगना और कक्षा में पढ़ाई का माहौल बनना संभव होगा। लोगों का सरकारी स्कूल से
विश्वास उठ रहा है। सरकारी स्कूल का लचर प्रशासन और उसके सुचारू रूप से नहीं चल पाने के कारण यह मान्यता बन
गई है कि प्राइवेट में पढाई होती है, सरकारी में नहीं।


यह दो-मुँही व्यवस्था इसलिए बनी क्योंकि उसी तंत्र ने कुछ शालाओं को बचाया, वहां प्रधानाध्यापक के प्रशासन को
कायम रखा और प्रोत्साहन भी दिया। दूसरी ओर, जहाँ संख्या कम हो रही थी वहाँ प्रशासन ने शिक्षकों को दोषी ठहराया
और प्राइवेट स्कूल पर लगाम नहीं लगाई। कई राज्यों में यह नियम है कि सरकारी स्कूलों की मौजूदगी में एक हद के
ऊपर प्राइवेट स्कूलों को अनुमति नहीं दी जाती, ताकि छात्रों को खींचने की प्रतिस्पर्धा न हो। लोगों का विश्वास कायम
रखने के लिए कोई कदम नहीं उठाया, जैसे पहले भर्ती अभियान हुआ करता था। इन स्कूलों को बाज़ार से जूझने में मदद
नहीं की, बल्कि उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया। स्कूल प्रशासन ने सुचारू व्यवस्था बनाने में अपनी भूमिका नहीं
निभाई।


इस दशा में शिक्षकों का मनोबल टूटा और निराशा का माहौल बन गया। सभी के लिए अपनी नौकरी बचाना लक्ष्य
बन गया और व्यवस्था को सुधारने का जज्बा खत्म होने लगा। राजनीतिक शक्ति भी कुछ चुने हुए स्कूल, जैसे – ‘सीएम
राइज’ पर केन्द्रित हो गई। ऐसे में दो-मुँही व्यवस्था अपने आप उभरकर सामने आने लगी। प्रशासन लोगों को दोषी कहने
लगा कि उन्होंने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से हटाया और प्राइवेट की होड़ में लग गए।


यदि हम आँकड़े देखें तो मध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां शिक्षक अतिशेष हैं और बहुत से क्षेत्रों में शिक्षकों की
कमी है। मध्यप्रदेश में ‘यूनीफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन’ (यूडीआईएसई) के वर्ष 2015-16 के आंकड़ों में प्राइमरी स्तर की 30% शालाओं में शिक्षकों की कमी थी और 16% में शिक्षक अतिशेष थे। उसी प्रकार माध्यमिक स्तर की 74% शालाओं में शिक्षकों की कमी थी और 8% शालाओं में अतिशेष थे। कई जगहें जहाँ सरकारी स्कूल कुछ व्यवस्थित हैं वे हमेशा माँग करते हैं कि उनके पास विषयानुसार शिक्षक नहीं हैं। खासकर गणित, अंग्रेज़ी और विज्ञान के शिक्षकों की माँग रहती है।


विडम्बना यह है कि अतिशेष की छवि इतनी हॉवी हो गई है कि हम वास्तविक कमियों को देख नहीं पाते। इस दशा
में ब्लाकवार योजना बनाने की ज़रूरत है, जहाँ सरकारी स्कूल चल रहे हैं उनकी टीम की पूर्ति करते हुए इन शालाओं को
बचाया जा सकता है। स्कूल प्रशासन से यही माँग है कि हर शाला के लिए एक सशक्त हेडमास्टर दें और उसे पर्याप्त टीम
मिले, ताकि शाला व्यवस्थित और नियमित लगे। स्कूल का प्रशासन सुचारू देखकर ही लोगों में विश्वास बढ़ेगा और
प्राइवेट की तरफ होड़ थमेगी। जो सरकारी स्कूल ठीक से चल रहे हैं वहाँ प्रशासन मज़बूत है।


प्रशासन की इच्छा-शक्ति इतनी कमज़ोर हो गई है कि कई उच्च राजनैतिक नेता यह मानने लगे हैं कि सरकारी
स्कूल सुधर ही नहीं सकते और प्राइवेट स्कूल की तरफ जाना ही रास्ता है। लोगों की अनौपचारिक बातचीत में उनकी यह
सोच झलकती है। आज के दौर में यह समझना ज़रूरी है कि स्कूल का एक समूह, जिन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया
है और वे बंद होने की कगार पर हैं। दूसरा समूह है, जहाँ प्रशासन मज़बूत है, बच्चे और शिक्षकों की संख्या पर्याप्त है
और उम्मीद का माहौल है।


प्रशासन जनता को ही दोषी मानता है, इसलिए ज़रूरी है कि अब जनता से ही आवाज आए कि स्कूल प्रशासन को
सभी शालाओं के लिए मज़बूत बनाना है। मध्यप्रदेश में आज स्थिति ऐसी है कि 27% स्कूलों में बच्चों की संख्या तीस या
उससे कम है। एक या दो ‘पाँच सितारा’ स्कूल हमें चकाचौंध कर सकते हैं, पर सार्वजनिक व्यवस्था नहीं सुधरती। सामान्य
सार्वजनिक व्यवस्था चाहे वह स्कूल हो या अस्पताल, सुचारू रूप से चलने पर ही विश्वास हासिल कर पाएगी। (सप्रेस)
 

 श्री अरविन्द सरदाना ‘एकलव्य फॉउन्डेशन’ के पूर्व-निदेशक हैं।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments