गोपेश्वर। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोपेश्वर में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरूण, उत्तराखंड द्वारा आयोजित बहुउद्देशीय शिविर के दौरान बुग्यालों, वनों एवं पर्यावरण संरक्षण में स्थानीय छात्र – छात्राओं को जोड़े जाने के लिए जागरुकता अभियान संचालित करने की मांग की गई। शिविर में चंडी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र (CPBCED), गोपेश्वर की ओर से राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष को पत्र सौंपकर बुग्यालों एवं वन क्षेत्रों के संरक्षण के लिए विद्यालय स्तर पर व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की मांग की गई।
पत्र में कहा गया है कि चंडी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र पिछले लगभग 12 वर्षों से वन, वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में विभिन्न गतिविधियां संचालित कर रहा है। संस्था द्वारा ग्रामीण युवाओं एवं स्कूली छात्र-छात्राओं को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए वन संरक्षण, बुग्याल बचाओ अभियान तथा वन्यजीव संरक्षण को लेकर जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं।
पत्र में बुग्यालों को हिमालयी पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा गया है कि ये क्षेत्र दुर्लभ वनस्पतियों एवं जड़ी-बूटियों के प्राकृतिक भंडार हैं। इन क्षेत्रों से स्थानीय लोगों की आजीविका भी परंपरागत रूप से जुड़ी रही है। पत्र के अनुसार उत्तराखंड में 8,524 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र बुग्यालों एवं बुग्याली वनस्पतियों से संबंधित है। इनके संरक्षण में स्थानीय समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
पत्र में बुग्यालों के समक्ष बढ़ते दबाव को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। पारंपरिक आजीविका में बदलाव के कारण कई बुग्याल बड़े मवेशियों के चरागाहों में परिवर्तित हो रहे हैं। इसके साथ ही अनियोजित एवं अनियंत्रित पर्यटन और तीर्थाटन से भी इन संवेदनशील क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है। वन क्षेत्रों में आग की घटनाओं को भी पर्यावरण संरक्षण के लिए गंभीर चुनौती बताया गया है।
संस्था ने सुझाव दिया है कि बुग्यालों एवं वन क्षेत्रों के आसपास स्थित सरकारी और गैर-सरकारी विद्यालयों में नियमित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। विद्यार्थियों को प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने के लिए सप्ताह में एक दिन अध्ययन एवं पर्यावरणीय गतिविधियों के लिए निर्धारित करने का सुझाव भी दिया गया है।
पत्र में विद्यालयों के ईको-क्लबों को बुग्याल एवं वन संरक्षण गतिविधियों से जोड़ने तथा वन एवं शिक्षा विभाग के माध्यम से आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाने का अनुरोध किया गया है। संस्था का मानना है कि नई पीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर ही हिमालयी पारिस्थितिकी और प्राकृतिक संसाधनों का दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकता है।

