गोपेश्वर।
नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी (NRSC) की जोशीमठ को लेकर 2001 में तैयार रिपोर्ट को यदि राज्य सरकार अमल में लाती तो आज फिर से इसरो की याद नहीं आती।
भारत सरकार के कैबिनेट सचिव के निर्देश पर उत्तराखंड के मालपा और उखीमठ के भूस्खलन के हादसे में जान गंवाने वाले तीन सौ से अधिक लोगों और भारी संपति के नुकसान के बाद पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट के अनुरोध पर हुई यह मैपिंग दो दशक से भी अधिक समय से राज्य सरकार और जिला अधिकारियों की अलमारियों में धूल फांक रही हैं। न कभी स्थानीय प्रशासन और नहीं लंबे तामझाम वाले राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने इसकी सुध ली।
बीते दिवस उसी जरुरत को जोशीमठ में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने महसूस की। उन्होंने इसरो से इस आपदा में फिर से तकनीकी सहायता की गुहार लगायी है। लेकिन अधिकारी इस रिपोर्ट को दो दशकों से दबाए हुए हैं। मुख्यमंत्री नेअंतरिक्ष से लिए गए चित्रों की मदद से जोशीमठ को उबारने की बात अधिकारियों को समझायी।
अंतरिक्ष विभाग अपनी नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी की मदद से लगभग दो दशक पूर्व ही देश में हिमालय के जानकार माने- जाने वाले बारह शीर्षस्थ वैज्ञानिक संस्थानों के साथ मिलकर जोशीमठ नगर और उसके आसपास के इलाकों का अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए इन संस्थानों के विज्ञानियों की मदद से भूस्खलन के खतरों की पहचान कर 2001 में राज्य सरकार को इसकी मैपिंग और रिपोर्ट सौंप चुका है। यह रिपोर्टें पिछले दशक पहले ही न केवल राज्य सरकार अपितु उत्तराखंड के देहरादून, टिहरी, उत्तरकाशी,पोड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग पिथौरागढ़, नैनीताल समेत चमोली के जिला अधिकारियों को भी अलग से अंतरिक्ष विभाग सौंप चुका है।
रिपोर्ट का उपयोग हो इसके लिए उसी दौर में अंतरिक्ष विभाग की ओर से देहरादून स्थित आईआरएसआई में सभी जिलाधिकारियों और तत्कालीन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों जिनमें डा आर एस टोलियां भी थै और जनप्रतिनिधियों तथा समाजसेवियों के साथ इस रिपोर्ट के उपयोग को लेकर पूरे दिन बैठक भी की थी। यह संवाददाता भी उस बैठक में प्रतिभाग कर चुका है। बैठक में वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में जिला अधिकारियों ने रिपोर्ट के आधार पर बचाव की कार्रवाई को लेकर हामी भरी थी, बैठक में फिर से उन्हें यह मैप और रिपोर्ट सौंपी गई थी। दुर्भाग्यवश 1913 के केदारनाथ हादसे के दौरान भी इस रिपोर्ट का उपयोग न कर पाने पर राज्य सरकार को आलोचनाओं से दो चार होना पड़ा था और अब फिर से जोशीमठ हादसे में भी यही सब दोहराया जा रहा है।
लेंडसलाइड हैजर्ड जोनोसन मैपिंग के नाम उत्तराखंड के चारधाम नेशनल हाईवे और मानसरोवर यात्रा मार्ग के शहरों के भूस्खलन के ख़तरों को लेकर बनी इस रिपोर्ट को पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट के आग्रह पर तत्कालीन कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार ने इसरो के अध्यक्ष कस्तुरीरंगन ने एनआरएसए के नेतृत्व में तैयार की थी।
इस रिपोर्ट में जोशीमठ शहर के 124.54 वर्ग किलोमीटर के इलाके को भूस्खलन के खतरे के नजरिए से छह भागों में बांटा गया था जिसमें 99 फीसदी से अधिक क्षेत्र को भूस्खलन की जद में होना बताया था। जिसमें बहुत अधिक खतरे वाली जगह पोने पांच फीसदी बतायी गई थी जबकि तीसरी श्रेणी जो उच्च खतरे की थी उसमें उनचालीस फीसदी इलाका चिन्हित किया गया था। मोडरेट और वो में क्रमशः 28 और 29 फीसदी इलाके को चिंहित किया गया था। खतरे की दृष्टि से ऐसा मात्र दशमलव 3 फीसदी ही सबसे कम बताया गया था।
इस रिपोर्ट को तैयार कराने के लिए की बार कैबिनेट सचिव और एनआरएसए (NRSA) के तत्कालीन सदस्य और इसे तैयार करने के लिए हुई बैठकों बैठकों में दिशानिर्देश के लिए शामिल हो चुके नब्बे साल के चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं ‘ केदारनाथ हादसे की तरह अभी भी हम समस्या को टालने के लिए अध्ययन पर अध्ययन की राह पर ही चल रहे हैं। जोशीमठ को लेकर 1976 में मिश्रा समिति जिसका में भी सदस्य था और 2001 की नेशनल रिमोट सैंसिग एजेंसी की लेंडसलाईड हैजैर्ड जोनेशन रिपोर्ट में वे सब जानकारी भरी हुई है जिनकी हमें इन आपदाओं से बचने की जरूरत है। अभी भी समय है अभी उपलब्ध इन विज्ञानियों के कार्यों का उपयोग इन संवेदनशील इलाकों को बचाने और यहां के लोगों को सुरक्षित करने में कर सकते हैं।
एक तरफ हमारे पास पहले से ही हमारे ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक संस्थानों के सटीक अध्ययन उपलब्ध हैं तो दूसरी ओर फिर से नए अध्ययनों के नाम पर इन समस्याओं के निराकरण में देरी या लटकाने की स्थिति को लेकर लोगों में आक्रोश भी दिख रहा है।

