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Uttarakhand Panch Kedar. पुराणों में रुद्रमहालय

Rudramahalaya in the Puranas.

Rudramahalaya in Puranas

विनय सेमवाल

पूर्व से चली आ रही निश्चित तिथि ज्येष्ठ मास की संक्राँति इस बार सोमवार दिनांक 15 मई को चतुर्थ केदार एकानन भगवान श्री रुद्रनाथ जी का चल विग्रह अपने शीतकालीन प्रवास स्थल गोपेश्वर स्थित गोपीनाथ मंदिर के गर्भ गृह से अपने धाम रुद्रमहालय को प्रस्थान हेतु मंदिर प्राँगण में स्थित गद्दी पर विराजमान हो गये हैं। जहाँ से भगवान का चल विग्रह भोग मूर्ति ३गते ज्येष्ठ दिनाँक 17 मई को अपने धाम हेतु प्रस्थान करेगी।

६ गते ज्येष्ठ दिनाँक 20 मई को पूर्ण विधि विधान एवं वैदिक मंत्रोचार के साथ शीतकाल में समाधि मे लीन रहे एकानन शंकर को समाधि से जगाया जाएगा। इसी के साथ ही पंच केदारों मे से एक चतुर्थ केदार के कपाट भी अब सभी भक्तों और श्रद्धालुओं के लिए अगामी कार्तिक मास की संक्राँति तक छः माह तक दर्शनार्थ खुल जायेंगे।

केदार क्षेत्र, शिव की क्रीड़ा स्थली

महिर्षि वेदव्यास ने, हिमालय के इस संपूर्ण केदार क्षेत्र को,जो पश्चिम में नंदा पर्वत , पूर्व में काष्ठगिरी एवं उत्तर में रत्नस्तंभ से लेकर दक्षिण में माया क्षेत्र तक पचास योजन लंबा और तीस योजन क्षेत्र तक विस्तृत है, में मुख्यतः रुद्रमहालय को भगवान् शिव की क्रीड़ा स्थली कहा है।

नंदापर्वतमारभ्य यावत् काष्ठगिरीर्भवेत्। तावत् केदारकं क्षेत्रं शिवमंदिरमुत्तमम्।। रत्नस्तंभं समारभ्य मायक्षेत्रावधि स्मृतम्। अति पुण्यप्रदस्थानं हिमालयपदान्वितम्।। पंचाशद् योजनयां त्रिशद् योजनविस्तृतम्।।

भगवान शंकर के दर्शनार्थ इस क्षेत्र के तीर्थों की यात्रा ‘ रामायण’ और ‘महाभारत’ से भी प्राचीन अनादि काल से चली आ रही है। पौराणिक मान्यताओ के अनुसार भगवान् श्री राम ने ब्रह्म हत्या के दोष के निवारणार्थ तथा द्वापर युग में पाण्डवों ने भी भगवान् शिव के दर्शनार्थ इस क्षेत्र की यात्रा की थी। यहाँ तक कि पाण्डवों नें स्वर्गारोहण भी शिव के इसी पवित्र धाम में हिमालय के इन्हीं बर्फाच्छादित् उतुँग शिखरों से ही किया था। आदिगुरु शंकराचार्य ने भी इसी क्षेत्र में तप कर चार धामों की स्थापना करने के पश्चाद् यही से स्वर्गलोक को गमन किया था ।

स्कंद पुराण में भगवान् शिव माता पार्वती से इस क्षेत्र की महिमा बताते हुए कहते हैं कि, “पूर्वं हि पाण्डवै: सर्वै गोत्रहत्यासमन्वितै:। केदारेश इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु मुक्तिद:।” पूर्व में जब पाण्डव गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति के लिए मेरी शरण में आये तो मेरे केदार क्षेत्र में ही उन्हे गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति मिली। मेरा यह मुक्ति दाता केदार देश तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।

पाण्डव और शिव की पंच केदार लीला

पाण्डवों, भगवान शिव तथा केदार क्षेत्र एवं पंच केदारों का स्कंद पुराण में प्रसंग इस प्रकार मिलता है। महाभारत युद्ध के पश्चात पाण्डव गोत्रहत्या के पाप से ग्रसित हो गये। तब भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें इस पाप से मुक्ति के लिए भगवान् शिव की शरण में जाने की सलाह दी।

श्री कृष्ण की सलाह पर सभी पाण्डव भगवान् शिव के दर्शन के लिए शिव नगरी काशी गये। लेकिन भगवान् शिव पाण्डवों से महाभारत युद्ध के चलते नाराज थे अतः वे उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे। शिव काशी से अंतर्ध्यान होकर हिमालय के केदार क्षेत्र में चले गये।

पाण्डव भी शिव का पीछा करते हुए केदार क्षेत्र में पहुँच गये। पाण्डवों को अपने समीप आता देखकर भगवान् शिव ने बैल का रूप धारण कर लिया। भीम ने बैल रूप में शिव को पहचान लिया और उन्हें पकड़ने के लिए ज्यों ही आगे बड़े भीम को अपने समीप आते देख शिव जमीन में घुस गये ।

शिव को पकड़ने के दौरान भीम के हाथ में बैल रूपी शिव का धड़ आ गया और शिव वहाँ पर धड़ रूप में ही विराजमान हो गये। जो द्वादश ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ के नाम से जाना गया।

हिमालय के केदार क्षेत्र में भगवान् शिव का निरंतर पीछा करने के क्रम में पांडवो को इस क्षेत्र में शिव के अलग-अलग अंगो के ही दर्शन जैसे केदारनाथ में धड़, मध्यमहेश्वर् में मध्य भाग नाभि,तुंगनाथ में भुजा, रुद्रनाथ में मुख और कल्पेश्वर् में जटा के ही दर्शन हो पाये थे। केदार क्षेत्र में स्थित होने से ये सभी स्थान पंच केदार कहलाये। उ

त्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित इन पाँच केदारों में से तीन केदार केदारनाथ, मध्यमहेश्वर, और तुंगनाथ रुद्रप्रयाग जनपद में तथा दो केदार रुद्रनाथ और कल्पेश्वर् चमोली जनपद में स्थित हैं।

चतुर्थ केदार रुद्रनाथ महात्म्य

संपूर्ण विश्व भर में भगवान शिव का यही एकमात्र धाम है, जहाँ भगवान शिव के एकानन स्वरूप के साथ मुखारविंद के दर्शन होते हैं। यहाँ भगवान शिव साक्षात मुख लिङ्ग के साथ विराजमान हैं।

इसके बाद भगवान शिव के चतुरानन स्वरूप के दर्शन काठमांडू Kathmandu के पशुपतिनाथ में तथा पंचानन स्वरूप के दर्शन इंडोनेशिया Indonesia में ही होते हैं।

रुद्रनाथ चमोली जिले के जिला मुख्यालय से 22किमी. की दूरी पर समुद्र तल से 2289मी. की ऊँचाई पर हिमालय की धवल चोटियों के मध्य खूबसूरत बुग्यालों के मध्य स्थित है। यहाँ प्राकृतिक गुफा में भगवान शिव का उसी समय का वही दक्षिण मुखी एकानन स्वरूप वाला श्यामवर्णीय स्वयंभू लिङ्ग है, जब उन्होंने पाण्डवों को दर्शन दिये थे।

पाण्डवों को अपने इस स्वरूप के दर्शन देने के प्रसंग को माँ पार्वती से विस्तार पूर्वक बताते हुए भगवान शिव कहते है कि, “पूर्वं हि पाण्डवै: सर्वै गोत्रहत्यासमन्वितै:। केदारेश इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु मुक्तिद:। अधोमार्गेण देवेशि मन्मुखुं तु महालाये।।” इसीलिए हे देवेशि अधोमार्ग के कारण मेरा मुख महालय में विद्यमान है।

अंधकासुर वध वृतान्त

स्कंद तथा अन्य पुराणो में रुद्रनाथ के बारे में भगवान् शिव द्वारा माँ पार्वती को इस क्षेत्र के बारे में बताते हुए यह प्रसंग भी मिलता है कि, इसी स्थान पर अंधकासुर के अत्याचारों से पिड़ित देवताओं ने उनकी “जय देव जयेशान जय रुद्र जयेश्वर” कहते हुए निम्न स्त्रोत से आराधना और स्तुति की थी।

नमस्त्स्मै महेशाय महते ज्ञानचक्षुषे। निराधाराय विश्वाय प्रभवायाव्ययत्मने। । चंद्रसूर्यायग्निनेत्राय पंचशिर्षाय दण्डिने। गङ्गाधराय देवाय नमस्तेस्तु त्रिमूर्तये।। ,,,,,,,,न जाने तव महिम्नो हि पारं क्षंतव्यमेव मे ।

और तब देवों की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने सभी देवताओं को अंधकासुर के अत्याचारों से मुक्ति देने का वचन प्रदान करते कहा था,

मामेव शरणं प्राप्ता ह्यन्धकस्य भयार्दिताः। गुरोस्तव महापिठेस्मिन् रुद्रालाये प्रिये। इदं प्रियतरं स्थानं मामास्त्येव न संशयः। अतः समग्रभावेन पार्वत्या च गणे: सः।

हे देवो निसंदेह यह स्थान मुझे अत्यंत प्रिय है अतः आपके स्नेह के कारण समग्रभाव से मै, पार्वती और अपने गणों के साथ यहाँ निवास करूँगा। इस स्थान से बढ़कर कोई दूसरा स्थान मुझे प्रिय नही है।

वीरभद्र उत्पति प्रसंग

मान्यता है कि यहीं पर भगवान शिव ने अपनी जटा के बाल को डुमक नामक स्थान पर पटकर वीरभद्र की उत्पति की थी। जटा का बाल जिस स्थान पर गिरा वहाँ डमड- डमड की आवाज से भयंकर नाद उत्पन्न हुआ था। यह स्थान आज डुमक के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर भगवान वीरभद्र जी का मंदिर भी है।

वीरभद्र जिन्हें शिव ने अपने गणों में प्रथम गण की पदवी से विभूषित किया था यहाँ के क्षेत्रपाल और इस संपूर्ण परिक्षेत्र में शिव के मंत्री हैं। हर वर्ष रक्षाबंधन के अवसर पर वीरभद्र भक्तों के साथ अपने स्थल डुमक से शिवधाम में अपने प्रभु के दर्शन करने आते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान शंकर भी अपने प्रिय गण से मिलने धाम में आते हैं।
क्या कहा है? भगवान् शंकर ने रुद्र महालाय के बारे में

श्रुणु देवी प्रविक्षामि तृतीयम वै ममालयम्। रुद्रालयमिति ख्यातं तिर्थानां तीर्थमुत्तमम्।।१।
रुद्रालयं महापुण्यं नानातीर्थविभूषितम्।। २।। न तज्यामि कदाचिद्वै क्षेत्रंक्षेत्रज्ञको यथा। इदं गुह्यतमं स्थानं देवानामपि दुर्लभम्।। ३।। दृष्ट्वा यद्वै सकृदपि जन्म साफल्यतां व्रजेत्। धन्यास्ते त्रिषु लोकेषु मानुषीषु च योनिषु।। ४।।

भगवान शंकर अपने इस स्थान को सबसे प्रिय बताते हुए माता पार्वती से कहते हैं, हे देवी! सुनो मेरा तीसरा आलय (निवास) सभी तीर्थो में उत्तम रुद्रलाय के नाम से विख्यात है। जैसे आत्मा शरीर को नही छोड़ती वैसे ही मैं भी अत्यंत गुप्त एवं देवताओं को भी दुर्लभ इस स्थान को नही छोड़ता हूँ। इस स्थान का वर्णन सुनने मात्र से ही मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

जो कोई एक बार भी इस स्थान को देख लेता है, उसका जन्म सफल हो जाता है। तीनों लोकों में मनुष्य योनि में जन्म लेने वाले वे व्यक्ति धन्य हैं, जो देवताओं को भी दुर्लभ इस स्थान का दर्शन करते हैं। मेरे साथ श्री हरि विष्णु भी जिनकी में निरंतर स्तुति करता हूँ, यहाँ सदा निवास करते हैं।

तस्मान्मम च विष्णोश्च भेद बुद्धिम् न कारयेत्। यत्राहं संस्थितो देवी तत्र विष्णु: सनातनः।। इदं प्रियतरं स्थानं मामास्त्येव न संशयः

अतः हे देवी ! मुझमे तथा विष्णु में भेद नही करना चाहिए। जहाँ में हूँ वहीं सनातन श्री हरि विष्णु भी विद्यमान रहते हैं। इसलिए इस स्थान से बढ़कर कोई दूसरा स्थान मुझे प्रिय नही है।

रुद्रमहालय क्षेत्र के अन्य तीर्थ

वैतरणी:- मंदीर परिसर से आधा किमी.की ढलान पर स्थित पवित्र वैतरणी नदी है। जिसे स्थानीय लोग वैतरणी कुंड कहते है। यहाँ के बारे में पुराणों में कहा गया है कि यहाँ पर पित्रो को तर्पण देने से उन्हे सभी प्रकार की तृप्ति प्राप्त हो जाती है। यहाँ पर एक पिण्ड दान करने से उतना ही पुण्य प्राप्त होता है जितना गया में एक हजार पिण्ड करने से होता है।

श्रीश्वर उवाच।। ऊँ शैलराजस्य पृष्ठे तु श्रुणु स्थानानी यानी वै।। अस्ति पुण्या महादेवी नदी वैतरणी शुभा।। १।।
पितृणाम् तोयदानेन तृप्तिर्भवती पुष्कला।। तत्रापि परमं देवी पश्येद्रुद्रहिमालायम्।। २।। हिमालये तु चेद्दतं तृटिमात्रं हि कांचनम्।। तेन दत्ता भवेत्सर्वा सप्तद्विपा वसुन्धरा।। ३।। आत्मानं घातयेद्यस्तु भृगुपृष्ठेषु: मानवः।। इंद्रेण धारिते छत्रे रुद्रलोकं स गच्छति।। ४।। गत्वा हिमालायं पुण्यं दृष्टा महेश्वरम् पदम्।। वासात्संतारायेत्सद्यो दश पूर्वान्दशापरान्।। ५।। (के.क.)
श्रुणु देवी वरारोहे तिर्थानि रहतामम पार्वती। तत्र वैतरणी श्रेष्ठा पितृऋणाम तारिणी सरित्। रम्यं शिवमुखं तत्र सर्वाभरणभूषितम्। तत्र पिण्ड प्रदानेन गया कोटि फलं लभेत्।

सरस्वती कुंड:– मंदिर के पार्श्व भाग मे पूर्व की ओर पाँच सौ मी. की दूरी पर पवित्र सरस्वती कुण्ड है। जिसके बारे में भी पुराणो में उल्लेख मिलता है कि यहाँ मृकण्ड नामक एक मत्स्य भगवान् शिव की कृपा और दर्शन की कामना लिए कई हजार वर्षों से इसी कुंड में निवास कर रहा है। जो कृष्ण पक्ष की मंगलवार को पड़ने वाली महाचतुर्दशी के दिन अपने परिवार के साथ इस कुण्ड में दिखाई देता है। पुराणों में इसकी विशेषता का वर्णन निम्नवत है।

तस्य पूर्वे महाद्रो हि सरः सारस्वतं स्मृतम्। तस्मिन्सरोवरे मत्स्यो मृकुण्डर्नाम नामतः।।
स वै मत्स्यो महादेवी बहुवर्षसहस्रवान्। तस्मिन्सरोवरे मग् शिव सायुज्यकामुकाः।।

महाकृष्णचतुर्दश्यां भौमवारे स मत्स्यकः। चलते तज्जले देवी दृश्यमानः स्वकैर्जने:।।
तस्मिन्सरोवरे स्नात्वा कृष्णं प्रति चतुर्दशीम। जडोपि वाक्पतेस्तूल्यः सत्यमेव न संशयः।।

मानस तीर्थ (मानस कुंड)

देवो को भी दुर्लभ बताते हुए इस तीर्थ के मानस सरोवर के बारे में कहा गया है कि, जो भी भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र के साथ इसके जल का एक बार आचमन करने से ही मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यही मूँगे के रंग वाला शिवलिङ्ग है। जिसका रुद्राष्ठाध्यायी अथवा बृहत्साम मंत्रो से पूजन करने वाले ब्यक्ति को मृत्योपरांत शिव लोक की प्राप्ति होती है।

प्रवालवर्णवर्णो हि तत्र लिङ्गधरो मृडः। तं पूजयित्वा रूद्रेण बृहत्साम्नाथवा शिवम्।।

पीली माटी:- मानस तीर्थ के पूर्व में इसकी स्थिति बताते हुए कहा गया है कि ,यहाँ पीले रंग का एक सरोवर भी है। जहाँ मणिभद्र ने शिव की तपस्या की थी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर आशुतोष शिव ने उसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ अपना यह स्थान प्रदान कर दिया था। इस स्थान पर मन से निष्ठा पूर्वक तीन रात्रि तक ओम् नमः शिवाय मंत्र का तीन हजार बार जप करने से भक्त को खेचरी सिद्धि प्राप्त होती है। यहाँ के जल को लेकर गंगा शब्द के उच्चारण मात्र से ही सभी तीर्थों में स्नान का पुण्य प्राप्त हो जाता है।

यात्राहं मणिभद्रेणाराधितस्तपसा शिवे। तस्मै प्रादां स्वकं स्थानं देवैरपि दुरासदम्।।
तत्र त्रिरात्रमासिनो रसाक्षरयुतं मनुम्। जप्तवा सहस्त्रत्रितयं खेचरीगुटीकां लभेत्।।

नालं विस्तरतः प्रोक्तुं सर्वांशेन शतं समा:।सर्वाण्येतानि तिर्थानि गङ्गायां नास्ति संशयः।।
रक्तवर्ण तीर्थ(लाल माटी) :- देवतायतनस्यार्वाक् क्रोशार्द्ध रक्तवर्णकम्।मानसं तिर्थमाख्यातं शिवलोकप्रदायकम्।

प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण यह रमणीक तीर्थ महालय में धाम से आगे लगभग पाँच किमी. की दूरी पर है। स्थानीय स्तर पर लाल माटी के नाम से जाना जाता है।
इसके अतिरिक्त मन्दिर परिसर में ही पांडवो तथा वन देवियों और वनदेवों के भी मंदिर हैं। मान्यता है कि शीत काल में ये ही
भगवान की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि इस पूरे क्षेत्र में वन देवियाँ हर वक्त विचरण करती रहती हैं।

रुद्रमहालय में तीर्थ सम्यक व्यहार और लोकाचार

हमारे धर्म ग्रंथों में तीर्थों की शुचिता और पवित्रता बनाये रखने वाले नियमों तथा तीर्थो की यात्रा करने के दौरान बरते जानी वाली सावधानियों के अनुपालन करने के स्पष्ट उल्लेख मिलते है। अन्यत्र हिकृतं पापं तीर्थ मसाद्य नश्यति। तिर्थेषु यत्कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति।। अन्यत्र किया गया पाप नष्ट हो सकता है लेकिन तीर्थ यात्रा में किया गया पाप नष्ट नही होता।

जिन पर अमल करते हुए हमारे पूर्वजों ने भी इनकी पवित्रता को अक्षुण रखने हेतु इस क्षेत्र में भ्रमण को लोक व्यवहार और कई नियमों तथा वर्जनाओं से भी बाँधा है। जैसे कतिपय स्थानों पर मुख्यतः बुग्यालों (उच्च हिमालयी घास के मैदान)में थूकना, शौच करना, चुप रहना, तेज आवाज में बात नही करना, भड़कीले कपड़े नहीं पहनना, निर्धारित तिथि से पहले जड़ी बूटी का विधोहन तथा फूलों को न तोड़ना, आदि।

भगवान शिव ने जिसे अपना आलय बताया है, वह प्राकृतिक छटा और नैसर्गिक सुंदरता से कितना परिपूर्ण होगा समझा जा सकता हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित होने के कारण यह धाम पर्यावरणीय दृष्टि से भी संवेदनशील है। अतः इस क्षेत्र में हमें तिर्थानुकूल और पर्यावरण सम्मत व्यवहार के अनुरूप ही यात्रा करनी चाहिए जिससे यहाँ की शुचिता,और पवित्रता भी बनी रहे तथा साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान न पहुँचे।

संकलन
विनय सेमवाल

Rudranath Rudramahalaya in Puranas.
The diety of Rudranath mahadev would start his annual migration from Gopinath Temple towards Rudranath Temple on 17th May 2023.

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