Tuesday, January 13, 2026
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आस्था के पथ पर इतिहास का शिलालेख- अनुसूया यात्रा पथ

Historical rock inscription in Siroli near Anusuya Devi Temple, Mandal, Chamoli Uttarakhand

विनय सेमवाल
अनादि काल से पुत्रदायिनी माँ सती अनुसूया के मंदिर में वर्षभर मुख्यतः भगवान दत्तात्रेय की जयंती के सुअवसर पर भक्त, श्रधालु और निःसंतान दंपति संतान की वर प्राप्ति के लिए पहुँचते रहे है। मंदिर तक पहुँचने के यात्रा मार्ग में लगभग 4.5 किमी की दूरी पर पहाड़ की अनगड शिलाओं के मध्य एक शिला के समीप लगा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का बोर्ड उस पर उत्कीर्ण लेख की जानकारी देता है कि उस कालखंड में भी कई कारवां यहाँ से गुजरे है। जिसे अक्सर हम आते-जाते एक नजरभर देखकर अधिकांशतः नजरंदाज कर देते हैं । जबकि वह पाषाण खुद पर उत्कीर्ण लेख से हमें उस कालखंड से परिचित कराने हेतु कई सदियों से प्रकृति के झंझावटों यथा गर्मी,जाड़ा बरसात को जडवत सहते हुए इतिहास में सिरोली अभिलेख के रूप में दर्ज होकर यह मौन गवाही भी देता है, कि 1700 वर्ष पूर्व भी यह यात्रा पथ आज की ही तरह इसी प्रकार भक्तों की ऐसी ही चहल पहल तथा जयकारों से गुँजायमान होता रहा है। तब इस वियावान में श्रधालुओं की प्यास बुझाने हेतु एक शासक के सामंत द्वारा जल की व्यवस्था की गई थी। जिसके विवरण की जानकारी उसके सीने पर उकेरी गई हैं। यह जडवत पत्थर हमारे लिए यात्रा की पौराणिकता तथा साहित्यों में वर्णित इस तीर्थ की प्राचीनता का साक्ष्य प्रकट करता एक लिखित अभिलेखीय दस्तावेज भी है।

अनुसूया शिलालेख, Rock inscription in Anusuya

सर्वप्रथम 1967 में इस पर उत्कीर्ण लेख और उसमे वर्णित विषय को आम जनमानस तक पहुँचाने का श्रेय जी. एस.गाइ महोदय को जाता है। जो उस समय भारतीय सर्वेक्षण विभाग में उत्तरी क्षेत्र के सुप्रिटेंडिंग अर्कियोलॉजिस्ट के पद पर कार्यरत थे । उन्होंने 1966 में लेख का प्रिंट (छापा) लेकर 1967 में इसका भाषानुवाद कर अपने शोध को ईपिग्राफिया इंडिका में प्रकाशित कर इस क्षेत्र के इतिहास की अहम कढी को जोड़ने का कार्य किया।इनके द्वारा इस लेख के भाषानुवाद के पश्चाद ही इस क्षेत्र में लिखित दस्तावेज द्वारा मौखरियो की उपस्थिति का भी पता चला।

गाइ महोदय द्वारा लेख का भाषानुवाद

1:- महाराजाधिराजा श्री परमेश्वरा
2:- सर्ववर्मनपदअनुधित्य
3:- श्री महालया वृद्धेश्वरा देवा
4:- कुल कृपाका क्षत्रिया
5:- नरवर्मन मातृ पित्रोआत्मना
6:- सचा पुण्यण्या
7:- पानी (नी)या संग्रह कृता

नरवर्मन द्वारा सात पँक्तियों में पँक्तिबद्ध कराया गया यह लेख उत्तरी ब्राह्मी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है। लिपि एवं नामों की साम्यता से इसे छट्वी शताब्दी के मध्य का तथा लेख मे संदर्भित सर्व वर्मन को लेख में वर्णित उपाधि महाराजाधिराज परमेश्वर के आधार पर मौखरी नरेश सर्ववर्मन ही माना है। इस पर सभी इतिहास कार भी एकमत हैं।जिसका शासन काल भी (516ई.से 580ई.) छटवी शताब्दी का मध्य है।हालाँकि उक्त लेख में सर्ववर्मन के वंश का नामोलेख नहीं है।

शिलालेख में नर वर्मन खुद को महालय वृद्धेश्वर् मंदिर का निर्माण करने वाले महाराजाधिराज परमेश्वर सर्ववर्मन का सेवक बताते हुए कहता है कि उसके (क्षत्रिय नरवर्मन )द्वारा यहाँ पर अपने पित्रों के पुण्यार्थ जल संग्रहण (पनिया संग्रह ) का निर्माण कराया गया है।

मौखरियो के इस क्षेत्र में उपस्थिति को लेकर यह लेख एक महत्तवपूर्ण कढी है। जिसके आधार पर आगे और शोध जैसे उनका इस क्षेत्र पर प्रभाव, शाषन करने का स्वरूप क्या था? क्या नरवर्मन यहाँ सिर्फ एक धार्मिक यात्री के तौर पर यहाँ आया था? या वह इस क्षेत्र में सर्ववर्मन का अधीनस्थ शासक या सामंत था?

अभिलेख में सर्ववर्मन को महालय वृद्धेश्वर् मंदिर का निर्माण करने वाला भी बताया गया है। स्थान के नाम का उल्लेख नही होने से यह कठिन है कि उसके द्वारा महालय वृद्धेश्वर् मंदिर का निर्माण कहाँ कराया गया। जबकि शिलालेख देवी के मंदिर के पास है। क्या? उसके द्वारा श्रीरुद्रनाथ क्षेत्र में तो इस प्रकार के किसी मंदिर का निर्माण तो नहीं किया गया। क्योंकि वह भी यहाँ से लगभग 17 किमी.की दूरी पर स्थित है।

क्या गोपेश्वर त्रिशूल अभिलेख में वर्णित गणपति नाग और नाग शक्ति का इस क्षेत्र से अस्तित्व मिटाने वाली मौखरियों शक्ति तो नही थी?

आदि कई ऐसे प्रश्न,कढियाँ तथा उलझी हुई और अनसुलझी हुई गुत्थियाँ है जो सुलझाये जाने के लिए शोध की बाट जो रही है।

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