ओम प्रकाश भट्ट
पपड़ियाणा। चमोली।
यदि कहीं समस्या है, हल भी है। पपड़ियाणा गांव के 90 साल के मुरारी लाल जी ने इसे और आगे बढ़ाते हुए समस्याओं में ही समाधान छिपा है का विचार प्रस्तुत करते हुए इसे साकार किया है।
समस्याओं में ही छिपा है समाधान
पपड़ियाणा गांव के समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता मुरारी लाल जी की पांच दशक की तपस्या में यह देखा जा सकता है।
गांव की घास-लकड़ी की दिक्कत और इसके लिए लोगों के रात-दिन के कठिन परिश्रम से विचलित मुरारीलाल जी के दिमाग में इस समस्या का निजात समीप की ही बंजर और सूखी पहाड़ी में दिखायी दिया।
बात आठवें दशक की है, घास और जलौनी लकड़ी की समस्या विकट थी। इसके लिए मुरारीलाल जी के गांव के लोग-खासकर गांव की औरतों को बीस से तीस किलोमीटर की पैदल दूरी तय करनी पड़ती थी। घास और जलावन के लिए सुबह चार बजे घर से निकल जाती थी, बिरही से आगे गाड़ी और आसपास के जंगल के लिए। घास और जलौनी लकड़ी एकत्रित कर सूरज ढलने के बाद ही घर लौट पाती थी। कई बार ऐसा भी होता था कि सूरज ढलने के बाद भी वे गांव नहीं पहुंच पाती थी, परिवारजन आधे रास्ते तक उन्हें लेने चले जाते थे। मुरारी लाल भी इनमें एक थे। मुरारीलाल कहते हैं, जब भी वे अपने परिवारजनों को लेने आधे रास्ते तक जाते थे तो पीठ पर रखे बोझ से ज्यादा भार अपनी बेचारगी और लाचारी को देखकर महसूस होता था। स्थिति यह थी की इस दौरान न ठीक से खाना, न ठीक से साफ-सफाई और आराम। सुबह उठो और निकलो फिर देर साम या रात घर वापसी। यह हमारे गांव की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। और दूसरों के जंगल में घास-लकड़ी संग्रह के दौरान पकड़े जाने पर लज्जित होने का कष्ट अलग से था। वे कहते हैं इस दौरान जब भी में परिवारजनों को लेने आधे रास्ते तक जाना होता था तो यह कष्ट उन्हें हर बार और गहराई तक कचोटता था।

A meeting in Papiyana village organized by Murari Lal
फोटो: चंडी प्रसाद भट्ट, Pic: Chandi Prasad Bhatt
भ्रमण से मिली सीख
दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल और सर्वोदय के कार्यक्रमों के सिलसिले में गांव-गांव जाने का मौका भी मिलता था। कई गांवों के आसपास गांववाले के जंगल देखने को मिलते थे। उनकी जंगल की सहुलियत से मन में उनके प्रति ईर्ष्या का भाव जागृत होता था। मुरारीलाल ने बताया कि आठवें दशक में चण्डी प्रसाद भट्ट जी के साथ मंदाकिनी घाटी के बशुकेदार इलाके की यात्रा के दौरान एक गांव का सुंदर जंगल देखा और लोगों को गांव के पास ही काश्तकारी की सुविधा मिलती देखकर भट्ट जी से चर्चा कर अपने गांव में भी ऐसा ही जंगल हो इसके लिए प्रयास करने का प्रण किया।
गांव के लोगों को किया तैयार
मुरारीलाल बताते है कि इसके बाद गांव के जागरूक लोगों और महिलाओं से इस संबंध में चर्चा की कि क्यों नहीं हमारे गांव में भी अपना वन और घास के इलाका हो। हमारे गांव को भी गांव के आसपास से ही, पूरा नहीं, तो कुछ समय के लिए, जलौनी लकड़ी, हरी चारा-पत्ती और सूखी घास मिले।
पपड़ियाणा गांव में जंगल नहीं था लेकिन बंजर जमीन और पहाड़िया मौजूद थी। तय किया गया कि गांव के समीप की जो भूमि बंजर है उसे हरा-भरा बनाया जाय और गांव की घास, लकड़ी की जरूरते कुछ हद तक इसके जरिये पूरी की जाय।
गांव के लोगों से इस संबंध में बात की। महिलाओं ने तत्काल हामी भर दी। पहली बैठक् में तय किया गया कि गांव के बगल पर वंथा नाम का जो इलाका है उसे पालतु-मवेशियों एवं सामान्य वन संबधी काश्तकारी के लिए कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाय। इसके लिए महिलाओं ने चौकीदारी करने की जिम्मेदारी के साथ उस पूरे इलाके में कांटेदार झाड़ियों की शाखायें लाकर घेराबंदी की। ध्येय ये था कि गलती से भी उस इलाके में कोई न जाय।
हमारे गांव को भी गांव के आसपास से ही, पूरा नहीं, तो कुछ समय के लिए, जलौनी लकड़ी, हरी चारा-पत्ती और सूखी घास मिले।
– मुरारीलाल जी
पूजा-पाठ के साथ शुरू हुआ हरियाली संवर्धन का कार्य
मुरारीलाल जी कहते हैं कि शुरूआत में यह सब करने के बाद चण्डी प्रसाद भट्ट जी से गांव में आने का आग्रह किया गया। बंद किए गए क्षेत्र में सभी गांववासी गांजे-बाजे के साथ गए। पण्डित भाष्करानन्द थपलियाल जी ने इलाके की पूजा की और पहला पौधा बांज का लगाया गया भट्ट जी के हाथों से। सभी गांववालों ने इस बंजर जमीन पर पहली बार पौधरोपण की शुरूआत की। मुख्यरूप से बांज और तुन के साथ जंगली प्रजाति के घास आदि के पौधे रोपे गए।
जून में यह इलाका बंद किया और पौध रोपे गए। दिसम्बर माह तक महिलाएं बारी-बारी से लगातार इस इलाके की चौकीदारी करती रही। छह महीने में ही नतीजा निकल आया। वंथा के लगभग पांच हैक्टेयर के इस इलाके में धरती पर घास लहलहाने लगी। जो टूट वाले पेड़ और झाड़ियां थी वे पुनर्जीवित होकर हमसे बतियाने लगी थी।
छह महीने में आए नतीजें
मुरारीलाल जी कहते हैं, पहले छह महीने की इस उपलब्धि पर सभी गांववासी मोहित थे। गांव में फिर से बैठक हुई। वंथा की बंजर धरती घास उगी थी, पेड़ों पर जो चारा-पत्ती थी और झाड़ियों में की जो सूखी टहनियां उनका गांव के हर परिवार को लाभ मिले, इसके लिए मिटिंग कर नियम तय किए गए। तय किया गया कि 25 दिसंबर को संग्रह के लिए उत्सव मनाया जाय। हर परिवार से एक सदस्य इसमें शामिल हो। पहले दिन सूखी घास एकत्रित करने के लिए हर घर से एक-एक व्यक्ति जाए। फिर चार दिन बाद सूखी-लकड़ी और आखरी में चारा-पत्ती का संग्रह करेंगे। सभी ने निर्णय माने। जंगल में उपदी उत्सव मनाया गया।
उपदी-महोत्सव की पड़ी नींव
पंडित भाष्करानंद थपलियाल जी के वेदमंत्रों और पूजा-पाठ के बाद उपदी उत्सव शुरू हुआ। चार दिन तक सूखी घास,चार दिन तक सूखी टहनियां और एक दिन हरी-चारापत्ती। 9 दिन के उपदी-उत्सव से ग्रामीण खासकर महिलाओं का उत्साह बढ़ गया।
मुरारीलाल जी कहते हैं तब पपड़ियाणा में सभी जातियों के लगभग 65 परिवार थे। लोगों को गांव की विकट समस्या का इतना सीधा और सपाट हल ने हैरान कर दिया था। मुरारीलाल ने महिलाओं से वंथा के समीप के दूसरे बंजर इलाके को भी इसी तरह संरक्षित करने का सुझाव दिया। गांववाले मान गए और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कांटै की झाड़ियों को घेरबाड़ का साधन बनाते हुए उसे भी वंथा की तरह ही संरक्षित कर दिया। परिणाम यह रहा कि दूसरे साल 25 दिसम्बर से होने वाले उपदी-उत्सव के दिन नौ से बढ़कर अठ्ठारह हो गए यानी लोगों को दो साल में ही घास और लकड़ी की उपलब्धता प्रति परिवार अठ्ठारह बोझ मिलने लगी।
बांज के बीज रोपण से शुरूआत
लगभग साढ़े चार दशक पहले पपड़ियाणा गांव में मुरारीलाल जी की इस शुरूआत ने इस गांव के हर ग्रामवाशी को गांव को हरा-भरा बनाने की मुहिम का हिस्सा बना दिया। मुरारीलाल और उनके सहयोगी साल में दो से तीन बार हरियाली बढ़ाने के लिए न केवल पौध रोपण करते हैं अपितु बीजों का रोपण भी करते हैं। बांज के बीज जिन्हें स् थानीय लोग लिंक्वाल कहते हैं,इन्हें आसपास के बांज बनो से एकत्रित करना और फिर झोले में भरकर गांव के इन संरक्षित इलाकों में बोना मुरारीलाल जी की जीवनचर्या का हिस्सा बन गया।
आज मुरारीलाल और पपड़ियाणा के गांववासियों की मेहनत का ही फल है कि ये इलाके अब बांज के सुंदर वन क्षेत्र में बदल रहे हैं।
भौगोलिक दृष्टि से बांज अपेक्षाकृत ऊंचाई पर उगने वाला पेड़ है लेकिन पपड़ियाणा के ये बांज वन इसके अपवाद बन गए हैं। इस कम ऊंचाई वाले इलाके में बांज के सघन पौधों और वन के तैयार होने से वनविद और वनाधिकारी भी हैरान है।


वन महकमा भी हुआ कायल
पपड़ियाणा के इस वन को देखने के लिए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम.लिग्दोह भी आ चुके हैं, तब उनके साथ तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के वन महकमें के मुख्य वन संरक्षक स्तर के एक अधिकारी भी आए थे जो इस कम ऊंचाई वाले क्षेत्र में बांजवन तैयार होने पर अचंभित थे।
चमोली के जिला मुख्यालय गोपेश्वर की नगर पंचायत का हिस्सा वन चुके पपड़ियाणा गांव का यह जंगल गोपेश्वर पोखरी मोटर मार्ग पर पोखरी बैंड से लेकर गैर पुल के उपरी भाग में है जो यहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आकर्षित करता है।
प्रेरणा के स्रोत है मुरारी लाल
45 वर्ष पहले मुरारीलाल ने प्रचार प्रसार से दूर गांव की इस समस्या के निदान के लिए जो पहल की थी 90 साल की उम्र में भी एक जवान समाजसेवी की तरह इस जंगल को बढ़ाने में सक्रिय है। उम्र से यह भले ही वह वृद्व हो गए हो लेकिन आज भी महीने में एक से दो बार जंगल की देखरेख करते देखे जा सकते हैं।
मुरारी लाल जी का जंगल और गांव के प्रति समर्पण व जीजिविषा, न केवल पपड़ियाणा अपितु आसपास के युवाओं को भी समाजकार्य की प्रेरणा दे रही है। उनका मूल मंत्र स्थानीय संसाधनों की पहचान और उसी से समस्याओं का निराकरण की मुरारी लाल जी की यह पहल न केवल उत्तराखण्ड अपितु पूरे देश के लिए अनुकरणीय है। उनके मेहनत ने उनके और उनके सहयोगियों के रोपे पौधों से जंगल हरा-भरा किया ही है साथ ही हजारों-हजार वनस्पतियों और पौधों को इस संरक्षण के जरिये प्राकृतिक पुनरउत्पादन का मौका मिला। यह जंगल लोगों की जरूरते भी पूरा कर रहा है तो जैवविविधता के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

